मेरे अभिन्न मित्र Arun Sahu जी के आत्मोत्सर्ग कि दिशा में किये जा रहे अनूठे प्र्यास कमोवेश मुझे भी आकर्षित करते रहते हैं. सच ही तो है जीवन बहुत छोटा है , और चैतन्य तो और सूक्ष्म है . फिर कैसे उस प्रकाश पुंज को पाया जाए, जो हमें सत्य का थोडा सा तो दर्शन करा सके.
द्रश्य, दर्शक और द्रष्टा और आज की आभासी दुनिया ..

दुनियां में तीन तरह के व्यक्ति हैं, वे, जो दृश्य बन गये—वे सबसे ज्यादा अंधेरे में हैं, दूसरे वे, जो दर्शक बन गये—वे पहले से थोड़े ठीक हैं, लेकिन कुछ बहुत ज्यादा अंतर नहीं है; तीसरे वे, जो द्रष्टा बन गए। तीनों को अलग—अलग समझ लेना जरूरी है।( ओशो)

ओशो ने बहुत ही सारगर्भित तरीके से तीनो तरह के मनुष्यों पर प्रकाश डाला है. सच है अगर हम द्रश्य बन गए हैं, तो शायद शुक्रवार को रिलीज़ होने वाली एक मूवी से ज्यादा कुछ नही. मैं खुद भी अपनी प्रेरक कार्यशालाओं में मनुष्य के द्रश्य होने पर जोर देता हूँ. जहाँ मैं बताता हूँ किसी इंसान को उसका एक ब्रांड के रूप में स्थापित होने क्यूँ आवश्यक है. और जब आप एक ब्रांड बन जाते हैं, तो पैकेजिंग का अपना बहुत बड़ा रोल शुरू हो जाता है. आपकी ड्रेस, आपकी हेयर स्टाइल, आपकी बॉडी लैंग्वेज, आपकी कम्युनिकेशन स्किल्स, सब का विशेष ध्यान देना होता है. सोचिये आज क्यूँ इमेज कंसलटेंट कि इतनी ज्यादा डिमांड है. पर क्या ये सत्य है, क्या ये जीवन के उस स्वरुप का दर्शन है, जो हमें हमारे खुद के होने के वास्तविक अहसास को कराएगा. शायद हाँ और शायद नहीं ... यही विरोधाभास तो जीवन है. जहां हमें दो आयामों का संतुलन रखना ज़रूरी है. अगर दृष्टा बनना है तो द्रश्य बनना ही होगा. पर द्रश्य बनकर खो जाना म्रत्यु है उस जाग्रति से जो हमें मनुष्य बनाती है .
समस्या आज खड़ी हो रही है इस सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में, जहाँ हम सब अपने आप को सिर्फ द्रश्य बनाने के लिए प्रयासरत हैं. हमारे वास्तविक स्वरुप और यहाँ प्रदर्शित हमारे रूप के बीच के अंतर को समझना हमारे खुद के लिए भी ज़रूरी है. लाइक्स और कमेंट्स कि दुनिया कितनी भयावह होती जा रही है, उसे यहाँ इस उदाहरण से समझा जा सकता है. अल्जीरिया में पिछले महीने एक व्यक्ति ने अपने बच्चे को इमारत की 15 वीं मंजिल से लटका कर उसकी तस्वीर फेसबुक पर लगा दी और साथ यह भी लिख दिया कि अगर इस पोस्ट पर एक हजार लाईकस नहीं मिले तो वह बच्चे को नीचे फेंक देगा। कहाँ जा रहे हैं हम .....
फ़ालोवेर्स ..... शायद इस एक शब्द ने हमें आत्ममुग्धता की अजीब सी दुनिया में पंहुचा दिया है. इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए वापस एक बार मन मंथन कि ज़रुरत है.
मेरी मित्र Rakhi Chauhan Mehta की आज कि पोस्ट बहुत ही शानदार थी , जिसमे उन्होंने आज के मनुष्य के स्वरुप का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है. उनका कहता है कि
It's a clear case of overdose of supplements..
brain inactivity due to over exercising ... sleep deprived coze of watching

'journey of hollywood Actors' vedios on you tube

(Eklavya syndrome)...

googling inspirational quotes 10,000 times (fake intelligence) ...
Pseudo self proclaimed mahan atma...Self admiration society .

क्या बात कही है कि आज हम सब सप्लीमेंट्स के ओवरडोज़ के शिकार हो रहे हैं. और मैं भी उनकी बात से सहमत हूँ. शायद ये सब हो रहा है, इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के इतने विशाल संसार में हमारे गोते लगाने के कारण. हकीकत में हम सब बकैत होते जा रहे हैं. हाँ शायद मैं भी...

देखिये मैं खुद भटक गया अपनी बात से.... यही इस बात का प्रमाण है, कि हमारा मस्तिष्क सूचना कि ओवरडोज़ का शिकार हो रहा है. कहाँ रह गया है अब धैर्य .... कहाँ रह गया है जीवन का वास्तविक आनंद ....
एकलव्य सिंड्रोम के शिकार हम सब को बदलना होगा ...

द्रश्य बनो, दर्शक बनो फिर खुद द्रष्टा बनना होगा

स्वयं के आत्मसाक्षात्कार से जीवन ये गढ़ना होगा

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