साल दो हज़ार सोलह का कैट का परिणाम आयाद है आपको, जिसमे एक बार फिर सौ परसेंटाइल पाने वाले या टॉप बीस छात्रों के परिणाम एक बार फिर सोचने पर मजबूर करते हैं, कि करियर के ऊंचे मुकाम पर जाने के लिए क्या इन्जिनीरिंग एक आसान विकल्प है. यश चौधरी ( कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग पुणे) और अविदीप्तो चक्रवर्ती ( बिट्स पिलानी, गोवा सेंटर), ने कैट दो हज़ार सोलह में शत प्रतिशत अंक लाकर ले सिद्ध कर दिया है, कि आज भी इंजीनीयर ही सवा शेर हैं. क्या ये सच है, आइये एक नज़र डालें.

           

विगत माह जब मैं कई शहरों में एक बड़ी इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी के लिए करियर काउन्सलिंग सेशंस कर रहा था, तो एक बात जो मुझे नज़र आई ,कि इन्जिनीरिंग के लिए छात्रों में आज भी वही उत्साह है, जो एक दशक पहले था. मैंने गहराई से इसका विश्लेषण करना प्रारम्भ किया तो कई महत्वपूर्ण कारण सामने आये, जो की आज भी इन्जीरिंग को सर्वश्रेष्ट करियर बनाता है.

 

बात शुरू होती है आइकन या प्रेरणाश्रोत से, जैसा की बहुत सामान्य बात है, एक छात्र जब जीवन में एक ऐसे मोड़ पर पहुचता है, जब उसे अपने करियर को एक दिशा देनी होती है, तो ज़ाहिर सी बात है, वो अपने आस पास सफलता को पा चुके व्यक्तियों की तलाश करना शुरू करता है. सामान्यता आज के दौर में करियर को दो ही दिशायें नज़र आती हैं, या तो कन्वेंशनल करियर जैसे की इन्जिनीरिंग, मेडिकल, गवर्मेंट जॉब्स या फिर अन्कन्वेन्शनल जैसे की बी बी ए, लॉ, आर्किटेक्ट, हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट, स्पोर्ट्स, मीडिया जैसे करियर. और फिर बात आती है, विभिन्न करियर के उच्च शिखर पर बैठे हुए सफलतम व्यक्तियों की.

 

राजनीति, खेल, सिनेमा, आधुनिक व्यवसाय हो या कोई भी और क्षेत्र, एक अजीब विसंगति है, कि ज़्यादातर सफलतम लोग इंजीनियरिंग के क्षेत्र से आ रहे हैं. उदाहरण स्वरुप राजनीति में मनोहर परिकर, अरविन्द केजरीवाल, अखिलेश यादव, प्रथ्वीराज चौहाण, नंदन नीलकेनी, जयराम रमेश, जयंत सिन्हा, खेल जगत से के. श्रीकांत, आर. अश्विन, जवागल श्रीनाथ, अनिल कुंबले, आर. बी. आई के भूतपूर्व गवर्नर्स रघुराम राजन, के. सुब्बाराव, सिनेमा एवं संगीत जगत से आर. माधवन, रीतेश देशमुख, शंकर महादेवन, सोनू सूद, सुशांत सिंह राजपूत, तापसी पन्नू, कीर्ति सेन, नागार्जुन, विख्यात लेखक चेतन भगत, अमीश त्रिपाठी इत्यादि. यानी कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आप सफलतम इन्जिनिअर्स को ही पायेंगे.

 

अगर अंतर्राष्ट्रीय परिद्रश्य में नज़र डालें तो विश्व की ‘फार्च्यून फाइव हंड्रेड’ कम्पनीज़ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (लगभग पैंतीस प्रतिशत) इंजीनियर्स हैं. आज अगर बदलती अर्थव्यवस्था के तौर तरीकों को देखा और समझा जाए, तो इस वैश्विक अर्थ व्यवस्था में जहाँ ई-कॉमर्स बहुत बड़ा रोल निभा रही है, और भारतीय एन्जीनिअर्स का जिस तरह से डंका राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बज रहा है, वो काबिले तारीफ़ है. सत्य नादेला और सुन्दर पिचाई जैसे नए यूथ आइकॉन हमारे देश में युवाओं के लिए प्रेरणा श्रोत बनकर उभर रहे हैं. और हो भी क्यूँ नही, जिस सुन्दर पिचाई के घर में टेलीफोन, टेलीविज़न और कंप्यूटर जैसी मूल भूत सुविधायें नहीं थी, आज उसी सुन्दर पिचाई को गूगल जैसी विख्यात कंपनी पिछले वर्ष छै सौ सड़सट करोड़ रुपये का वार्षिक वेतन देती है. आज एप्पल जैसी कंपनी में हर तीसरा इंजिनियर भारतीय है, जो की अपने आप में एक विशेष उपलब्धता है. यानी की अमेरिका की सिलिकॉन वैली में लगभग चालीस प्रतिशत इन्जिनिअर्स भारतीय हैं.

 

अगर घरेलू मार्किट की बात की जाए, तो ज़्यादातर स्टार्टस अप इन्जिनिअर्स ही शुरू कर रहे हों, चाहे फ्लिपकार्ट के सचिन या बिन्नी बंसल, माय्न्त्रा के मुकेश बंसल, ओयो कैब के रीतेश अग्रवाल या फिर पेटीएम् के विजय शेखर शर्मा. वर्ष 2014 में ई-कॉमर्स इंडस्ट्री में जैसी क्रांति आई, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई थी। दशकों से स्थापित कॉर्पोरेट कंपनियों तक को इसने अपनी ग्रोथ से चौंकाया। ऐसे में इसने युवाओं के लिए भी बेस्ट करियर ऑप्शन के रूप में काफी कम समय में पहचान बना ली है। भारत में तेज रफ्तार से इंटरनेट यूजर्स की संख्या बढ़ने से करीब 2.5 करोड़ लोग ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं। इस इंडस्ट्री का कारोबार आज 12 अरब डॉलर से ज्यादा का हो चुका है और साल 2020 तक इसके 75 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। मेट्रो सिटी से लेकर सुदूर गांव तक इंटरनेट ने ई-कॉमर्स के मार्केट की आसान पहुंच बना दी है।

 

कई भारतीय ई-कॉमर्स कंपनियां करोड़ों-अरबों का बिजनेस कर रही हैं। स्टार्टअप्स भी अपने इनोवेशन के साथ ई-कॉमर्स का फायदा उठा रहे हैं। इससे न सिर्फ एंटरप्रेन्योरशिप, बल्कि मार्केटिंग, फाइनेंस, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउस, ग्राफिक्स के क्षेत्र में जॉब के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

 

इन दिनों मैं आदित्या अय्यर की किताब ‘द ग्रेट इंडियन ओबसेशन’ पढ़ रहा हूँ, जिसमे आदित्य ने एक जगह लिखा है, की अगर भारत में ‘ इंजीनियरिंग एक धर्म होता तो ये पांचवा सबसे बड़ा धर्म होता’. सच है, लगभग सत्रह लाख एन्जिनिअर्स प्रति वर्ष बनाने वाला हमारा देश विश्व के विभिन्न देशों की नज़रों में बहुत महत्वपूर्ण स्थान लिए हुए है.

 

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू, उतना ही स्याह है, जितना शानदार ऊपर दिए गए आंकड़ों के आधार पर मैंने अपनी बात कही है. कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज एवं बोस्टन कंसल्टेंसी ग्रुप के साथ साथ अस्पैरिंग माइंड्स की रिपोर्ट्स के अनुसार, विगत चार वर्षों में रोज़गार क्षमताओं में कोई वृधि नही हुई है, जिसके कारण ही सत्रह लाख इन्जिनिअर्स में सिर्फ दो लाख ही नौकरी देने के काबिल तैयार होते हैं. यानी की लगभग चार हज़ार इंजिनीअरिंग कॉलेज, किस तरह के इंजिनियर का उत्पादन कर रहे हैं, बहुत आसानी से समझा जा सकता है.

 

एक छोटी सी विचारात्मक बात यहाँ बताना चाह रहा हूँ की सन दो हज़ार बीस के बाद भारत के ऊपर बहुत बड़ी वैश्विक ज़िम्मेदारी आने वाली है. समय से पहले चेतना और युवाओं को जाग्रत करता हमारा प्रमुख कर्तव्य है. विदित हो कि वर्ष दो हज़ार बीस में अमेरिका में एक करोड़ सत्तर लाख, ब्रिटेन में बीस लाख, जापान में नब्बे लाख , चाइना में एक करोड़ एवं रूस में साठ लाख सहित, विभन्न देशों में बहुत ज्यादा कार्ययोग्य जनसँख्या की कमी होगी वहीँ हमारे देश में लगभग सैतालिस करोड़ नए कार्य करने योग्य हाथ तैयार हो जायेंगे. सच तो ये है की आने वाले वक़्त में भारत के हाथ एक बहुत बड़ी ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ लगने वाली है, पर सोचने की बात ये हैं की आज हमारे पास स्किल्ड लोगों की कितनी बड़ी कमी है, जो कि वापस एक बार इस सुअवसर को हमसे खींच सकती है. आज जॉब मार्किट में कोई कमी नहीं है, वरन सच्चाई ये है, कि ये योग्यता की उस अंतिम पादान पर जाकर खड़े होते हैं, जहाँ कम्पनीज़ उनको जॉब देने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाती हैं.

 

एक विचार जो आपके समक्ष रख रहा हूँ, कि ‘बिग डाटा, क्लाउड कंप्यूटिंग, इन्टरनेट ऑफ़ द थिंग्स, वेअरेबल टेक्नोलॉजी’ जैसे नयी सदी के नए नए कैरियर्स में कैसे हमारे युवा अपनी पहचान बना पायेंगे, अगर हमने आधारभूत परिवर्तन नहीं किये. अब कैसे गुणवत्ता से समर्द्ध इंजिनियर तैयार करें हमारे कॉलेज एवं यूनिवेर्सिटी, ये एक गंभीर विचारात्मक विषय है, जिसमे सतत चिंतन एवं संवागनीय विकास के द्वारा ही कोई परिवर्तन पाया जा सकता है.

           

             

 

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